आज-कल अपनी जुबां के लफ्ज़ कहने को मन करता है,
तो मैं इन हवाओं से बात करती हूँ, ये तो एक ही हैं,
यहाँ भी, वहाँ भी,
सोचती हूँ कभी तो उड़ते हुए मेरी आवाज़ पोहोंचेगी,
वहाँ, जहाँ इसे समझने वाले हर सड़क और हर मोड़ पर खड़े हैं,
शायद उन्हें ये लगे की ये आवाज़, यहीं कहीं है,
इसी मिटटी में रहती है, कहीं आसपास ही गुनगुनाती है |
फिर सोचती हूँ कैसे रहते हैं लोग अपने आप से दूर, इन अनजान मुल्कों में,
क्या मोहोब्बत नहीं इन्हें अपनी रूह से ?
ऐसी क्या चीज़ है दुनिया में जो इतनी प्यारी है ?
अपने आप को भुलाने के लिए क्या इतने समुन्दर पार करना ज़रूरी है ?
ये काम तो हम बंद आखों से ही कर लेते हैं ||